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महज 600 रुपये की लागत में दो भाइयों ने मिलकर पानी और केरोसिन से चलने वाला चूल्हा बनाया।

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आपने LPG से चलने वाला चूल्हा देखा होगा और मिट्टी के तेल से चलने वाला चूल्हा भी देखा होगा। क्या आपने पानी और केरोसिन से चलने वाला चूल्हा देखा है? दरअसल मध्य प्रदेश की 11वीं के स्टूडेंट व्यासजी मिश्रा महज 16 साल की उम्र में ऐसा हाइब्रिड चूल्हा तैयार कर सबको हैरत में डाल दिया है। इस चूल्हे को ईंधन बचाने के मकसद से तैयार किया गया है और इस चूल्हे की खासियत है कि इसमें धुआं काफी कम निकलता है। सीमित साधनों के बावजूद व्यासजी मिश्रा ने अपने भाई की मदद से इस चूल्हे को तैयार किया है और इस खास तकनीक ने कई जगह पुरस्कार भी जीते हैं।

कैसे आया हाइब्रिड चूल्हा बनाने का विचार?
रिपोर्ट्स के मुताबिक व्यासजी ने हाइब्रिड चूल्हे को अपने बड़े भाई पवनजी मिश्रा की अधूरी कोशिश को पूरा करने के मकसद से तैयार करना शुरू किया था। सबसे पहले उन्होंने इसे 2001-02 के एक साइंस मेले में बनाने की कोशिश की थी। हालांकि इस पर सफलता तब मिली जब 2002-03 में दोनों भाइयों ने मिलकर इस पर काम शुरू किया।

इस हाइब्रिड चूल्हे को बनाने में दोनों भाइयों को करीब 6 महीने का समय लग गया। इसके बाद उन्होंने दो सामान्य केरोसिन स्टोव और तीन रेगुलेटरों को मिलाकर यह डिवाइस तैयार किया।
कैसे काम करता है हाइब्रिड चूल्हा?

कैसे काम करता है हाइब्रिड चूल्हा?
    इस स्टोव को दो अलग-अलग टैंकों के साथ बनाया गया। एक में केरोसिन था और दूसरे में पानी। दोनों टैंकों में हवा का दबाव बनाने के लिए पंप लगे थे और पाइप के जरिए वे एक ही बर्नर से जुड़े थे।
    इसे शुरू करने के लिए केरोसिन की मदद से बर्नर को तब तक गर्म किया जाता है, जब तक वह लाल न हो जाए।
    इसके बाद बर्नर के गर्म होते ही केरोसिन रेगुलेटर को बंद कर पानी का रेगुलेटर खोल दिया जाता है। गर्म बर्नर पानी को भाप में बदल देता है और इससे चूल्हे की आंच तेज रहती है।
    इसके बाद जब आंच धीमी होने लगती है, तो पानी को बंद कर फिर से केरोलिन को चालू किया जाता है, ताकि बर्नर दोबारा गर्म हो सके।​

कितनी आई लागत और क्या फायदा?
इस हाइब्रिड चूल्हे के प्रोटोटाइप को बनाने की कुल लागत करीब 600 रुपये आंकी गई थी। IIT गुवाहाटी ने इस तकनीक को ऑप्टिमाइज भी किया और पाया कि इससे 20% तक केरोसिन की बचत हो सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार(REF.) व्यासजी के पिता देवसर तहलील में क्लर्क थे और परिवार की सालाना आय 60 हजार रुपये से भी कम थी। आर्थिक तंगी में उनकी बड़े भाई और बीसीए स्टूडेंट ने उन्हें टेक्निकल और आर्थिक मदद दी, जिसकी वजह से हाइब्रिड चूल्हा बन सका।

Aditya
Author: Aditya

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