रीवा की पारंपरिक सुपारी शिल्पकला कभी राजसी संरक्षण में फली-फूली, आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।

मध्य प्रदेश के रीवा जिले की सुपारी से खिलौने, मूर्तियां और सजावटी कलाकृतियां बनाने की अनूठी कला प्रदेश की ऐतिहासिक हस्तशिल्प परंपराओं में शामिल है। इस कला का आधुनिक इतिहास वर्ष 1932 से जुड़ा माना जाता है, जब रीवा रियासत के तत्कालीन महाराजा गुलाब सिंह के संरक्षण में इसे नई पहचान मिली।
इस परंपरा को आगे बढ़ाने का श्रेय रीवा के कुंदेर परिवार को दिया जाता है। बताया जाता है कि रामसिया कुंदेर ने सबसे पहले सुपारी से आकर्षक सिंदूरदान और अन्य कलात्मक वस्तुएं तैयार कीं। उनकी उत्कृष्ट कारीगरी से प्रभावित होकर महाराजा ने उन्हें सम्मानित किया और इस कला को राजसी संरक्षण प्रदान किया।
समय के साथ यह शिल्प रीवा की सांस्कृतिक पहचान बन गया। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी इस कला की सराहना और प्रोत्साहन किया, जिससे इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
हालांकि, आधुनिक दौर में मशीनों के बढ़ते उपयोग, बाजार की बदलती मांग और कारीगरों की घटती संख्या के कारण यह पारंपरिक कला धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है। इसके बावजूद रीवा के कुछ शिल्पकार आज भी इस ऐतिहासिक विरासत को जीवित रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
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