सतना की राजनीति में इन दिनों एक सवाल कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है… क्या अब राजनीति में पहचान वर्षों के संघर्ष से बनेगी या शीर्ष संगठन मे बैठे बड़े पदाधिकारियों से सम्पर्क, बड़ी गाड़ी से उतरकर माइक पकड़ने और सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीर दिखाने से?
चर्चाएं हैं की वर्तमान मे जिले भर मे कुछ नए नेता और नेत्रियां अलग-अलग अंदाज में सक्रिय नजर आ रहे हैं। कोई धार्मिक आयोजन कर रहा है, कोई स्वास्थ्य ठीक करने के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, कोई गरीबी दूर करने की बात कर रहा है तो कोई सड़क निर्माण को अपनी उपलब्धि बताकर प्रचार कर रहा है।
अब सवाल यह है कि जो आज गरीबी दूर करने निकले हैं, वह आगामी विधानसभा चुनाव तक दूर होगी या चुनाव के बाद भी अभियान चलता रहेगा, सायद यह जनता भी ज्यादा अच्छी तरह जानती है….
व्यंग्य की बात करें तो आज राजनीति का नया तरीका कुछ ऐसा दिखाई देता है, संगठन मे बैठे बड़े नेताओं से सम्पर्क बनाइये… बड़ी गाड़ी से उतरिए, माइक पकड़िए, दो बातें जनता के बीच कहिए, कैमरे के सामने खड़े हो जाइए और फिर सोशल मीडिया पर लिख दीजिए.. जनसेवा जारी है….
लेकिन दूसरी तरफ वे पुराने नेता और कार्यकर्ता हैं, जो वर्षों से पार्टी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पार्टी के सुख-दुख में खड़े हैं, गांव-गांव जाकर लोगों को जोड़ रहे हैं और संगठन को मजबूत कर रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वे शायद हर मदद के बाद कैमरा नहीं बुलाते..
यही वजह है कि कई समर्पित कार्यकर्ता आज भी पीछे की लाइन में खड़े दिखाई देते हैं और पार्टी को आगे बढ़ाने में लगे हैं, जबकि कुछ नए चेहरे आगे की लाइन में नजर आते हैं। सवाल यह नहीं कि सेवा कौन कर रहा है, सवाल यह है कि सेवा कितने दिन और किस उद्देश्य से हो रही है? क्योंकि राजनीति में आने वाले कुछ चेहरे शायद कुछ वर्षों बाद कहीं और दिखाई दें और जिन गांवों में आज बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहां फिर वही पुराने कार्यकर्ता जनता के बीच खड़े मिलें।
सोशल मीडिया की पोस्ट पुरानी हो सकती है, लेकिन जनता की याददाश्त इतनी जल्दी पुरानी नहीं होती।
आगे संगठन और जनता को तय करना है कि उसे चमकता चेहरा चाहिए या ऐसा नेता, जिसके दरवाजे तक पहुंचने के लिए किसी सिफारिश की जरूरत न पड़े…
लोगों का कहना है की अब अधिकांश राजनीतिक दलों मे संगठन के लिए वर्षों तक संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं की तुलना में आर्थिक रूप से मजबूत और प्रभावशाली लोगों को नेतृत्व और बड़ी राजनीतिक पहचान अपेक्षाकृत जल्दी मिल जाती है। इससे पुराने, जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं कि संगठन में उनकी वर्षों की निष्ठा और मेहनत का मूल्यांकन आखिर किस आधार पर होना चाहिए……