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4 सितंबर को चुनाव चिन्ह, 11 को वोटिंग; जयपुर में निर्दलीयों के सामने 7 दिन में पहचान बनाने की चुनौती

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जयपुर
नगर निगम चुनाव की पिच सज चुकी है। निकाय चुनाव फटाफट क्रिकेट यानी टी-20 की तर्ज पर हो रहा है। मैदान में उतरने के बाद प्रत्याशियों के पास लंबी पारी खेलने का मौका नहीं होगा। दलों के प्रत्याशियों की तुलना में निर्दलीयों के सामाने परेशानी ज्यादा होगी। निर्दलीयों को चार सितंबर को चुनाव चिन्ह मिलेंगे और 11 सितंबर को वोट पड़ जाएंगे। यानी चुनाव चिन्ह हाथ में आते ही सिर्फ सात दिन में मतदाताओं के बीच अपनी पहचान बनाने और वोट की अपील करने की चुनौती होगी।

पार्टी की 'टीम', निर्दलीय का 'वन मैन शो'
चुनावी मैदान में सबसे दिलचस्प मुकाबला पार्टी प्रत्याशियों और निर्दलीयों के बीच भी होगा। पार्टी के प्रत्याशी के पास संगठन, कार्यकर्ताओं और पार्टी की पहचान का सहारा होगा। बड़े नेताओं के संपर्क और बूथ स्तर का नेटवर्क भी उसकी ताकत बनेगा। इसके उलट निर्दलीय प्रत्याशी को समर्थकों की टीम बनानी होगी, मतदाताओं को चिन्ह समझाना होगा और बड़े नेटवर्क के सामने पहचान खड़ी करनी होगी।

4 को 'टॉस', फिर असली पारी
निर्दलीयों के लिए चुनाव चिन्ह आवंटन का दिन प्रत्याशियों के लिए टॉस जैसा होगा। इसके बाद रणनीति बनाने का समय नहीं, सीधे मैदान में उतरने का वक्त होगा। पोस्टर, पर्चे, सोशल मीडिया, वाहन प्रचार, घर-घर संपर्क और छोटी बैठकों के जरिए सात दिन में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी होगी।

'डेथ ओवर' में बढ़ेगा प्रचार का रन रेट
8 से 10 सितंबर प्रत्याशियों के लिए चुनावी डेथ ओवर होंगे। प्रचार का शोर बढ़ेगा और हर प्रत्याशी ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश करेगा। सुबह घर-घर संपर्क, दिन में छोटी बैठकें और शाम को जनसंपर्क यानी एक ही दिन में कई पिच पर खेलना होगा।
10 सितंबर की रात तक प्रत्याशियों की कोशिश होगी कि कोई मतदाता ऐसा न रह जाए, जिसे उसका नाम और चुनाव चिन्ह पता न हो।

250 निवर्तमान पार्षदों में से 91 ने चुकाई निगम की देनदारियां
इधर, जयपुर नगर निगम चुनाव के बीच 250 निवर्तमान पार्षदों में से 91 ने निगम के हिसाब किसाब साफ कर दिया है। यानी निगम से पार्षदों ने जो भी संसाधन ले रखे थे, उनको लौटाते हुए नो ड्यूज हासिल कर लिया है। इनमें भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष राखी राठौड़, पूर्व महापौर कुसुम यादव जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं। रमेश सैनी, लक्ष्मण लूनीवाल, दुर्गेश नन्दिनी, पारस जैन, नीरज अग्रवाल, उमरदराज, अजय चौहान, नरेंद्र शेखावत ने भी निगम से नो ड्यूज हासिल किया है। निवर्तमान पार्षदों का निगम से सीधे तौर पर जुड़ाव रहता है, ऐसे में विभिन्न शुल्क, लाइसेंस, संपत्ति या अन्य निगम संबंधी देनदारियों की स्थिति स्पष्ट करने के बाद नो ड्यूज लिया जाता है।

आखिर क्यों लेते हैं नो ड्यूज?
नगर निगम चुनाव में नामांकन दाखिल करते समय प्रत्याशी को निर्धारित दस्तावेज प्रस्तुत करने होते हैं। निगम से संबंधित किसी तरह का बकाया होने की स्थिति में प्रत्याशी को परेशानी का सामना करना पड़ सकता हैं। ऐसे में पहले से नो ड्यूज प्रमाण-पत्र लेना सुरक्षा कवच की तरह है।

Aditya
Author: Aditya

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