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बेटियों के जन्म से शिक्षा तक बदली तस्वीर, 11 साल में 918 से बढ़कर 929 हुआ लिंगानुपात

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चंडीगढ़
 हरियाणा के पानीपत से 22 जनवरी 2015 को शुरू हुई ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ मुहिम के 11 साल का हिसाब अब संसद में सामने आया है। 46 सांसदों के सवालों के जवाब में केंद्र सरकार ने बताया कि अभियान के दौरान देश में जन्म के समय लिंगानुपात 918 से बढ़कर 929 हो गया है।

वहीं, माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का सकल नामांकन अनुपात 2014-15 के 75.51 फीसदी के मुकाबले बढ़कर 2024-25 में 83.4 फीसदी पहुंच गया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हरियाणा के पानीपत से बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत की थी। इस समय केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल हरियाणा के मुख्यमंत्री थे। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार, अभियान की शुरुआत उस समय हुई थी जब बेटियों के जन्म को लेकर सामाजिक असमानता बड़ी चुनौती थी।

जून 2026 तक अभियान पर 1,075.37 करोड़ खर्च
प्रधानमंत्री मोदी ने पानीपत से इसकी शुरुआत करते हुए बेटियों के जन्म, संरक्षण और शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता से जोड़ा था। बाद में अभियान को स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला एवं बाल विकास जैसे क्षेत्रों से जोड़ते हुए देश के सभी जिलों तक विस्तार दिया गया।

फिलहाल यह ‘मिशन शक्ति’ के तहत संचालित हो रहा है। सरकार ने संसद में बताया कि जून 2026 तक अभियान पर 1,075.37 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस अवधि में देशभर में 78,305 कार्यक्रम आयोजित हुए, जिनमें 3.37 करोड़ से अधिक लोगों की भागीदारी रही। इनका उद्देश्य बेटियों के जन्म, शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और सामाजिक स्वीकार्यता को लेकर जागरूकता बढ़ाना रहा।

सरकार ने हालांकि इन आंकड़ों को अभियान की अकेली उपलब्धि के तौर पर नहीं बताया है। लिंगानुपात और शिक्षा में बदलाव के पीछे स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला सशक्तीकरण से जुड़े अन्य कार्यक्रमों की भी भूमिका रही है।

नीति आयोग ने 2020 और 2025 में किया मूल्यांकन
सांसदों ने अभियान की उपलब्धियों के साथ उसके प्रभाव और मूल्यांकन की जानकारी भी मांगी थी। केंद्र के अनुसार, नीति आयोग ने 2020 और 2025 में स्वतंत्र मूल्यांकन कराया। दोनों आकलनों में अभियान को प्रभावी बताया गया और इसके क्रियान्वयन को और बेहतर बनाने के लिए सुझाव दिए गए।

2015 में चुनिंदा जिलों से शुरू हुई मुहिम अब देशव्यापी अभियान बन चुकी है। संसद में पेश आंकड़े बताते हैं कि 11 वर्षों में बेटियों के जन्म और माध्यमिक शिक्षा में भागीदारी, दोनों प्रमुख संकेतकों में सुधार दर्ज हुआ है।

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Author: Aditya

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