पेट्रोलियम डिपो, एयरपोर्ट, इलेक्ट्रिक बसें, बरगी परियोजना और अधूरी योजनाएं, क्या जनप्रतिनिधि सतना का हक दिलाने में रहे नाकाम?….
सतना। कभी औद्योगिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक पहचान रखने वाला सतना आज विकास के कई महत्वपूर्ण पैमानों पर पीछे छूटता दिखाई दे रहा है। यदि आम नागरिक से पूछा जाए कि पिछले दो दशकों में जिले की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही, तो स्पष्ट उत्तर मिलना मुश्किल होगा। वहीं, खोए हुए अवसरों और अधूरी परियोजनाओं की सूची लगातार लंबी होती गई है।
सतना का पेट्रोलियम डिपो हटना जिले की बड़ी क्षति माना जाता है। इसे बचाने के लिए अपेक्षित राजनीतिक प्रयास नजर नहीं आए। द्वितीय विश्व युद्ध काल का एयरपोर्ट भी वर्षों से उपेक्षा का शिकार है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद नियमित हवाई सेवा शुरू नहीं हो सकी। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत हुए कार्यों पर भी सवाल उठते रहे हैं, क्योंकि शहर आज भी जाम, धूल, गड्ढों और अव्यवस्थित यातायात जैसी समस्याओं से जूझ रहा है।
बरगी परियोजना का पानी वर्षों से चुनावी वादों तक सीमित है। मेडिकल कॉलेज जनता के लंबे संघर्ष के बाद मिला, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और कैंसर यूनिट जैसी सेवाओं को स्थायी रूप से मजबूत करने में अपेक्षित प्रगति नहीं दिखी। रेलवे के मामलों में भी सतना को कई अवसर हाथ से निकलते देखना पड़ा, जबकि शिक्षा के क्षेत्र में आज भी शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं का अभाव महसूस किया जाता है।
हाल ही में सतना के लिए स्वीकृत 20 इलेक्ट्रिक बसों का अन्य शहरों को आवंटित होना और नए बस स्टैंड से नियमित संचालन शुरू न होना भी जनप्रतिनिधियों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विकास किसी एक दल या सरकार का नहीं, बल्कि निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम होता है। आज जब पड़ोसी रीवा शिक्षा, स्वास्थ्य, निवेश और आधारभूत ढांचे में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, तब सतना की जनता भी अपने जिले के लिए ठोस परिणाम और जवाबदेही की अपेक्षा कर रही है। अब समय भाषणों का नहीं, बल्कि अधूरी परियोजनाओं को पूरा कर सतना को उसका वास्तविक अधिकार दिलाने का है…









