सतना की सड़कों का भी अपना अलग अंदाज है। गर्मी में डामर बिछता है, सड़कें चमकती हैं और विकास की तस्वीर सुंदर नजर आने लगती है। लेकिन जैसे ही बारिश होती है, डामर की परत उखड़ने लगती है और गड्ढे फिर अपनी पुरानी जगह पर कब्जा जमा लेते हैं। अब 27 करोड़ रुपये के बजट से शहर की अधिकांश सड़कों के डामरीकरण की बात सामने आ रही है। ऐसे में सवाल है कि इस बार सड़कों की सूरत बदलेगी या फिर गड्ढों पर विकास का नया मेकअप चढ़ाया जाएगा?
सतना की सड़कों को देखकर लगता है कि यहां सड़कें बनाई कम और उनका सौंदर्यीकरण ज्यादा किया जाता है। डामर की परत चढ़ी, सड़क चमकी, काम पूरा हुआ और कुछ समय बाद बारिश ने पूरी पोल खोल दी। चेहरे का मेकअप उतरने पर असली चेहरा दिखाई देता है, ठीक वैसे ही सतना की सड़कों पर डामर उतरते ही गड्ढों का असली साम्राज्य दिखाई देने लगता है। फर्क इतना है कि चेहरे का मेकअप उतरने पर आईना देखा जाता है, लेकिन सड़क का मेकअप उतरने पर जनता नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है।
अब 27 करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने अ रही है। सवाल यह नहीं कि पैसा क्यों खर्च हो रहा है, सवाल यह है कि पहले बनी सड़कें आखिर इतनी जल्दी क्यों उखड़ गईं? अगर सड़क पहली बरसात भी नहीं झेल पाई, तो निर्माण की गुणवत्ता की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? संबंधित ठेकेदारों से जवाब क्यों नहीं मांगा जाना चाहिए? इंजीनियरों की निगरानी और जिम्मेदारी की समीक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए?
लोग महापौर योगेश ताम्रकार से सवाल कर रहे क़ी जनता को फोटो व सड़क पर डामर की चमक नहीं, उसकी मजबूती चाहिए। बजट कितना बड़ा है, यह बताने से ज्यादा जरूरी है कि सड़क कितने साल टिकेगी। आखिर जनता को हर बार नई सड़क का सपना दिखे और कुछ महीनों बाद वही गड्ढे स्वागत करने लगें, तो इसे विकास कहें या गड्ढों की वापसी का वार्षिक उत्सव?
नगर निगम को चाहिए कि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच कराए, खर्च का हिसाब सार्वजनिक करे और जहां लापरवाही साबित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई करे। स्मार्ट सिटी के दावे तभी सार्थक होंगे, जब आम आदमी बिना गड्ढों से जूझे सड़क पर चल सके।
क्योंकि डामर की चमक कुछ समय की हो सकती है, लेकिन खराब सड़क की परेशानी रोज की होती है…..