Edition

बेटे के सपनों के लिए पिता ने यूके में बनाया खाना, हिमांशु नांदल ने तीन पदक जीतकर रचा इतिहास

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

रोहतक
 बेटे की आंखों में रोशनी नहीं थी, लेकिन माता-पिता ने उसके सपनों को कभी धुंधला नहीं पड़ने दिया। लोगों ने उसे कमजोर समझा, पर परिवार ने हमेशा आगे बढ़ने का हौसला दिया। इसी विश्वास और सहयोग के दम पर गांव बोहर निवासी हिमांशु नांदल ने पैरा एशियाई खेल में तीन पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

इस सफलता के पीछे पिता बलवान का समर्पण और मां कविता का त्याग अहम रहा। वर्ष 2023 में पैरा एशियाई खेल में हिस्सा लेने के बावजूद हिमांशु पदक नहीं जीत पाए थे। इस बार बेहतर तैयारी के लिए उन्होंने करीब ढाई महीने यूके में अभ्यास किया। इस दौरान पिता बलवान भी उनके साथ रहे और बेटे की डाइट का ध्यान रखने के लिए खुद खाना बनाया, ताकि अभ्यास और खानपान में कोई बाधा न आए।

तीन महीने की उम्र में पता चली बीमारी
बलवान ने बताया कि हिमांशु जन्म से दृष्टिबाधित हैं। करीब तीन महीने की उम्र में परिवार को उनकी आंखों की समस्या का पता चला था। इलाज के प्रयासों के बावजूद दृष्टि वापस नहीं आई, लेकिन परिवार ने हार नहीं मानी। खुद खिलाड़ी रहे बलवान ने वर्ष 2015 में हिमांशु को पैरा जूडो से जोड़ा। वर्गीकरण संबंधी दिक्कतों के कारण उन्हें यह खेल छोड़ना पड़ा, जिसके बाद वर्ष 2021 में उन्होंने पैरा स्विमिंग शुरू की।

पिता बने कोच
शुरुआत में पिता ने ही कोच की भूमिका निभाई और बेटे को तैराकी सिखाई। दृष्टिबाधित होने के कारण हिमांशु कई बार पूल की दीवार से टकरा जाते थे और चोटिल भी होते थे। ऐसे समय में परिवार ने उन्हें डरकर पीछे हटने के बजाय अभ्यास जारी रखने के लिए प्रेरित किया। लगातार मेहनत और परिवार के भरोसे ने हिमांशु को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। एशियन पैरा गेम्स में तीन पदक उनकी इसी मेहनत और हौसले का प्रमाण हैं।

 

Aditya
Author: Aditya

Share करें

✓ Link copy हो गया!

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!