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मानव हस्तक्षेप से प्रभावित अरावली क्षेत्र की जैव विविधता में गिरावट

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 उदयपुर
 उदयपुर संभाग के जंगलों में आज भले ही तेंदुए, सियार और जंगली सूअर बड़ी संख्या में दिखाई दे रहे हों, लेकिन एक सदी पहले मेवाड़ के वन बाघ, शेर, चीता और जंगली कुत्तों जैसे शीर्ष वन्यजीवों की शरणस्थली थे।

जयसमंद वन्यजीव अभयारण्य पर किए गए एक शोध अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि मानव हस्तक्षेप, जंगलों के विखंडन और प्राकृतिक वन्यजीव गलियारों के टूटने से क्षेत्र की जैव विविधता में भारी गिरावट आई है।

शोध के अनुसार जयसमंद और आसपास का क्षेत्र कभी बाघ, शेर, चीता, भेड़िया, जंगली कुत्ता, काला हिरण, चिंकारा, चीतल, सांभर और नीलगाय जैसे वन्यजीवों से समृद्ध था। उस समय अरावली के जंगल पाली के गोरमघाट और कमलीघाट से लेकर मध्यप्रदेश तक फैले हुए थे, जिससे वन्यजीवों का आवागमन निर्बाध बना रहता था।

शिकार और जंगलों की कटाई बनी बड़ी वजह
विशेषज्ञों के अनुसार राजशाही काल में बड़े पैमाने पर शिकार और बाद के वर्षों में बढ़ते मानव दबाव ने वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचाया। खेती के विस्तार, खनन गतिविधियों, सड़क निर्माण और आबादी बढ़ने से वन क्षेत्र छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गए। इसका सीधा असर उन प्रजातियों पर पड़ा जिन्हें बड़े और निरंतर जंगलों की आवश्यकता होती है।

कई प्रजातियां हुईं स्थानीय रूप से विलुप्त
शोध में बताया गया है कि बाघ, शेर, चीता, जंगली कुत्ता और काला हिरण जैसी कई प्रजातियां जयसमंद क्षेत्र से स्थानीय रूप से विलुप्त हो चुकी हैं। वर्ष 2005 से 2009 के बीच किए गए अध्ययन में केवल 21 स्तनधारी प्रजातियां दर्ज की गईं, जिनमें से बड़ी संख्या कम या दुर्लभ श्रेणी में पाई गई।

वर्तमान में तेंदुआ और जंगली सूअर का दबदबा
हाल ही में उदयपुर संभाग की वन्यजीव गणना के अनुसार वर्तमान में जंगली सूअर 515, सियार 251, जरख 173 और तेंदुए 57 दर्ज किए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तेंदुए जैसे अनुकूलनशील वन्यजीव बदलते परिवेश में खुद को ढालने में सफल रहे हैं, जबकि कई संवेदनशील प्रजातियां लगातार सिमटती जा रही हैं।

कॉरिडोर बचाने की जरूरत
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि फुलवारी की नाल, जयसमंद, सज्जनगढ़ और कुंभलगढ़ के बीच प्राकृतिक वन्यजीव कॉरिडोर का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में जैव विविधता पर और गंभीर खतरा मंडरा सकता है। शोधकर्ताओं ने वन्यजीव आवासों की सुरक्षा, मानव हस्तक्षेप में कमी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया है।

 

Aditya
Author: Aditya

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