पानीपत
पानीपत में मुस्लिम परिवार दशकों से रामलीला के पुतले बनाकर सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश कर रहा है। यमुनानगर में रावलपिंडी से चली कारीगरी चार दशक बाद भी जारी है।
कुरुक्षेत्र में कैथल से शुरू हुआ हुनर पांचवीं पीढ़ी के हाथों तक पहुंच गया है, जबकि भिवानी में वर्ष 1902 से चली आ रही परंपरा आज भी 100 फीट के रावण का चेहरा गढ़ रही है।
इन परिवारों के लिए पुतले बनाना केवल रोजगार नहीं। यह उनके बुजुर्गों से मिला हुनर, परिवार की पहचान और उस सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प है, जिसमें दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत के साथ समाज को जोड़ने का संदेश भी देता है।
बदलते समय में पुतलों के आकार और डिजाइन बदले, सामग्री महंगी हुई, काम का तरीका बदला, लेकिन बांस मोड़ने, कागज साधने और रावण के चेहरे में भाव भरने की कला पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही।
मुस्लिम परिवार की गंगा-जमीनी तहजीब
पानीपत में दशहरा सांप्रदायिक सौहार्द की ऐसी तस्वीर पेश करता है, जिसमें मुस्लिम परिवार के हाथों से रामलीला के रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण आकार लेते हैं। असगर अली का परिवार दशकों से इस काम में जुटा है। उनके पिता हाजी अशरफ अली ने पानीपत में पुतले बनाने का काम शुरू किया था।
अब असगर अली के साथ उनके बेटे भी इस विरासत को आगे बढ़ा है। खास बात यह है कि एमसीए पास सॉफ्टवेयर इंजीनियर इमरान और बीटेक सिविल इंजीनियर सोहेल भी नौकरी -पेशा दुनिया के विकल्पों के बावजूद पिता के साथ पुतले बनाने में हाथ बंटा रहा है
50 कारीगरों की टीम रामलीला मैदानों के लिए पुतले कर रही तैयार
हर वर्ष दशहरे से करीब डेढ़-दो माह पूर्व परिवार पानीपत पहुंचता है। इस बार करीब 50 कारीगरों की टीम अलग-अलग रामलीला मैदानों के लिए पुतले तैयार कर रही है। सेक्टर-25 के लिए 100 फीट, सेक्टर-13-17 के लिए 90 फीट तथा श्री देवी मंदिर और माडल टाउन के लिए 70-70 फीट ऊंचे रावण के पुतले बनाए जा रहे हैं।
पुतलों का ढांचा बांस की खपच्चियों से तैयार होता है। खुले मैदान में धूप, बारिश और तेज हवा के बीच कारीगर दिन-रात जुटे रहते हैं। असगर परिवार के लिए यह काम केवल कमाई नहीं, बल्कि पानीपत की रामलीला परंपरा और सामाजिक भाईचारे का हिस्सा है।
यमुनानगर: रावलपिंडी से चली कारीगरी, चार दशक से जारी
श्री सनातन धर्म मंदिर में इन दिनों रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले आकार ले रहे हैं। इन्हें तैयार कर रहा है महेंद्र मनचंदा का परिवार, जिसके बुजुर्गों ने पाकिस्तान के रावलपिंडी में इस कला की हैं।
अब उनके बेटे पंकज भी साथ हैं। इस बार रावण 70 फीट, कुंभकर्ण 60 फीट और मेघनाद 50 फीट का होगा। महंगाई ने इस बार पुतलों की लागत बढ़ा दी है। पिछले वर्ष 160 से 170 रुपये किलो मिलने वाली सुतली 300 रुपये किलो हो गई है। करीब 500 रुपये में मिलने वाली कौड़ी 1000 रुपये से अधिक की है, जबकि कपड़े की कीमत भी लगभग दोगुनी हो चुकी है।
दशहरा ग्राउंड की 70 साल पुरानी परंपरा
यमुनानगर के दशहरा ग्राउंड में रावण दहन की परंपरा 1950 के दशक से जुड़ी है। पुराने रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 1952 में यहां दशहरा दहन हुआ था। इसके बाद यह स्थान दशहरा ग्राउंड के नाम से पहचाना जाने लगा।
कुरुक्षेत्र में रावण के पुतले बनाने वाले परिवार की कहानी कैथल से शुरू हुई और अब पांचवीं पीढ़ी तक पहुंच गई है। परिवार की चौथी पीढ़ी से जुड़े शमां खान बताते हैं कि उनके दादा छज्जु राम ने 1962-63 में कैथल में पुतले बनाने शुरू किए थे। इसके बाद उनके पिता मोहम्मद इस्लाम खान ने करीब 1985 में कुरुक्षेत्र में इस काम को आगे बढ़ाया। अब शमां खान और उनके बड़े भाई हाजी इसरार इस कारीगरी में जुटे हैं।
चौथी पीढ़ी के शाहरुख और सादिक खान भी काम सीख रहे हैं, जबकि पांचवीं पीढ़ी के अजमत और अब्बूजर खान भी इस हुनर से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
इस बार कुरुक्षेत्र में 101 फीट ऊंचा रावण तैयार किया जा रहा है। परिवार कुरुक्षेत्र के साथ कैथल, चीका, पाथड़ा, पिहोवा और खनौरी के लिए भी पुतले तैयार कर रहा है।
भिवानी: 1920 में दादा ने पुतला बनाना शुरू किया
भिवानी में रावण के पुतले बनाने की कहानी एक सदी से भी ज्यादा पुरानी है। महेंद्रगढ़ के बास मोहल्ला निवासी 76 वर्षीय मोहनलाल बताते हैं कि उनके दादा शिवदास ने वर्ष 1902 में पुतले बनाने शुरू किए थे।
फिर उनके पिता मंगलसेन और उसके बाद उन्होंने इस हुनर को आगे बढ़ाया। अब उनके बेटे श्यामलाल, मनीष और हरीश भी इसी काम में जुटे हैं।
पांचवीं पीढ़ी का कपिल भी बांस पकड़ना सीख रहा है। इस बार भिवानी में 100 फीट का रावण तथा 80-80 फीट के मेघनाद व कुंभकर्ण तैयार किए जा रहे हैं। परिवार हरियाणा के अलावा हिमाचल, दिल्ली और चंडीगढ़ समेत कई राज्यों में पुतले बनाता है।
एक बड़े सेट को तैयार करने में चार लाख रुपये से अधिक खर्च आता है। इस परिवार की कारीगरी को 100 से अधिक मेडल मिल चुके हैं।









