अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब, बता गया कि जननेता की असली पूंजी पद नहीं, जनता का भरोसा होता है….
सतना। राजनीति में किसी नेता की पहचान उसके पद और चुनावी जीत से होती है, लेकिन जनता के बीच उसकी जगह इस बात से बनती है कि पद से दूर होने के बाद भी वह लोगों के कितना करीब रहता है। नागौद विधानसभा से तीन बार विधायक रहे रामप्रताप सिंह का सार्वजनिक जीवन इसी बात की मिसाल रहा। सोमवार को दिल्ली में उनका निधन हुआ और मंगलवार को सतना में निकली अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब उनके लंबे जनसंपर्क और लोगों से बने आत्मीय रिश्ते की तस्वीर दिखा गया।
धवारी स्थित पतौरा हाउस से सुबह शुरू हुई अंतिम यात्रा में नागौद विधानसभा क्षेत्र के गांवों से लेकर सतना शहर तक के लोग शामिल हुए। किसान, व्यापारी, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों के साथ बड़ी संख्या में आम नागरिक भी उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे। रास्ते भर लोगों ने हाथ जोड़कर श्रद्धांजलि दी। कई लोग अंतिम यात्रा के साथ पैदल चलते रहे।
रामप्रताप सिंह के राजनीतिक जीवन में 1985 और 1990 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बनने के बाद 1998 का चुनाव एक अलग अध्याय रहा। कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने के बाद क्षेत्र के लोगों ने उन्हें निर्दलीय चुनाव लड़ने के लिए आग्रह किया। उनके आवास पर लगातार पहुंच रहे समर्थकों से उन्होंने स्वयं जनता की राय जानने का प्रयास किया। इसके बाद निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे और जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंचे। यह चुनाव उनके व्यक्तिगत जनसंपर्क और क्षेत्र में बनी स्वीकार्यता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना गया।
विधायक पद से दूर हुए तो किसानों के सवाल को बनाया संघर्ष…. विधानसभा से बाहर आने के बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन थमा नहीं। किसानों की सिंचाई और नर्मदा जल का मुद्दा उनके प्रमुख सरोकारों में शामिल हो गया। बरगी से नर्मदा का पानी सतना और विंध्य के खेतों तक पहुंचाने की मांग को लेकर उन्होंने नर्मदा जल लाओ संघर्ष समिति के माध्यम से गांव-गांव संपर्क किया। बैठकें, महापंचायतें और जनसंवाद उनके अभियान का हिस्सा बने।
2021 की धवारी महापंचायत सहित कई मौकों पर उन्होंने बरगी परियोजना की गति और सतना के हिस्से के पानी का मुद्दा उठाया। परियोजना की तकनीकी व्यवस्था, सुरंग और लिफ्ट सिंचाई जैसे विषयों पर भी वे अपनी राय रखते रहे। उनका जोर इस बात पर रहा कि नर्मदा का पानी स्थायी व्यवस्था के जरिए किसानों के खेतों तक पहुंचे।
2022 में बरगी परियोजना से जुड़ी सुरंग के निरीक्षण के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से उनकी मुलाकात और परियोजना से संबंधित विषयों पर चर्चा भी उनके इस अभियान का हिस्सा रही। अंतिम वर्षों तक वे सतना, रीवा और मैहर के किसानों के हिस्से के पानी को लेकर सवाल उठाते रहे।
सोशल मीडिया से दूर, सीधे लोगों के बीच रहा संपर्क.. रामप्रताप सिंह की सार्वजनिक सक्रियता का एक अलग पक्ष यह भी रहा कि उनका संपर्क मुख्यतः गांवों, बैठकों और आम लोगों के बीच दिखाई देता था। यही वजह रही कि मंगलवार की अंतिम यात्रा केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रही, अंतिम यात्रा मे जिले भर के जनप्रतिनिधि, नेतागण, व्यापारी, समाजसेवी आमजन सहित कई हजारों क़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
कलेक्ट्रेट चौराहे तक पहुंचते-पहुंचते अंतिम यात्रा जनसमूह में बदल गई। किसी के लिए वे तीन बार के पूर्व विधायक थे, तो किसी के लिए गांव में बैठकर बात सुनने वाले पुराने जनप्रतिनिधि। किसी को 1998 की चुनावी लड़ाई याद थी तो किसी को किसानों के लिए नर्मदा जल की मांग उठाते रामप्रताप सिंह।
प्रयागराज में पुत्र गगनेंद्र सिंह ने उन्हें मुखाग्नि दी और वे पंचतत्व में विलीन हो गए। उनके जाने के साथ एक सवाल फिर सामने है, विंध्य के खेतों तक नर्मदा का पानी पहुंचाने का वह संकल्प अब किस दिशा में आगे बढ़ेगा?
रामप्रताप सिंह अब इस सवाल को उठाने के लिए मौजूद नहीं हैं, लेकिन वर्षों तक उठाई गई उनकी आवाज उनके साथ जुड़े किसानों और क्षेत्र के लोगों की स्मृतियों में बनी रहेगी। शायद यही किसी जनप्रतिनिधि के सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी विरासत होती है, पद चला जाता है, लेकिन जनता से जुड़ा सवाल बाकी रह जाता है।