जिस रास्ते में कभी नदी पार कर स्कूल जाना पड़ा, उसी सफर ने मन में ठाना कि एक दिन ऐसी परेशानी किसी और को हो….
मजदूरी से शुरू हुआ जीवन जिला पंचायत, राज्यसभा और मंत्री पद तक पहुंचा……
मंडला। किसी इंसान की जिंदगी को केवल उसके आज से समझना हो तो शायद कहानी अधूरी रह जाती है। असली कहानी तो उस रास्ते में होती है, जिसे तय करते हुए वह आज की मंजिल तक पहुंचता है। मध्यप्रदेश सरकार की मंत्री संपतिया उइके का जीवन भी ऐसी ही कहानी है। यह सिर्फ राजनीति में आगे बढ़ने की कहानी नहीं, बल्कि अभावों के बीच पढ़ने, परिवार की जिम्मेदारी उठाने, मजदूरी करने, हार का सामना करने और हर बार खुद को संभालकर आगे बढ़ते रहने की कहानी है। उनके जीवन के कई ऐसे पड़ाव हैं, जिन्हें सुनकर यही लगता है कि इंसान अगर ठान ले और रास्ते में रुकने के बजाय चलते रहने का फैसला करे तो परिस्थितियां भी एक दिन रास्ता बदल देती हैं।
संपतिया उइके का जन्म मंडला जिले के शुर्खी गांव में एक सामान्य परिवार में हुआ। उनकी मां आठवीं तक पढ़ी थीं और बेटी को पढ़ाने के लिए हमेशा प्रेरित करती थीं। गांव में शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने धुतका गांव से आठवीं तक की पढ़ाई की, आगे पढ़ने के लिए उन्हें कई किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था।
एक समय ऐसा भी था जब स्कूल और गांव के बीच नदी पड़ती थी, वह अपनी बहन के साथ साइकिल से स्कूल जाती थीं और रास्ते में नदी पार करनी पड़ती थी, बारिश के दिनों में यही रास्ता मुश्किल बन जाता था, कभी स्कूल से लौटने में देर होती तो चिंता भी रहती।
यही परेशानी शायद उनके मन में कहीं गहरी उतर गई। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने मन में ठाना कि अगर कभी मौका मिला तो ऐसी समस्या का स्थायी समाधान कराएंगी, ताकि आने वाली पीढ़ी को वह परेशानी न उठानी पड़े। वर्षों बाद जब वे जिला पंचायत अध्यक्ष थीं, तब उस नदी पर पुल बनने का काम हुआ। उनके जीवन की यह छोटी-सी घटना उनके संघर्ष और सोच दोनों को समझने के लिए काफी है, जिस परेशानी को उन्होंने खुद झेला, उसे दूसरों के लिए दूर करने की इच्छा उनके भीतर पहले से थी।
पढ़ाई का सिलसिला भी परिस्थितियों के बीच जारी रहा। उन्होंने बम्हनी नगर से 12वीं की पढ़ाई की और आगे की पढ़ाई मंडला में हॉस्टल में रहकर पूरी की। बाद के वर्षों में भी पढ़ाई से उनका रिश्ता नहीं टूटा। वर्ष 2022 में, जब वे राज्यसभा सदस्य थीं, उन्होंने हिंदी विषय में एमए की डिग्री हासिल की।
लेकिन पढ़ाई के साथ जीवन की जिम्मेदारियां भी थीं। वर्ष 1990 में उनका विवाह संजय उइके से हुआ। उस समय उनके पति का पटवारी पद पर चयन हो चुका था, लेकिन पोस्टिंग नहीं हुई थी। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि इंतजार के दिनों को आसानी से काटा जा सके। ऐसे समय में संपतिया उइके ने ईंट-भट्ठे और खेतों में दिहाड़ी मजदूरी तक की। परिवार चलाने के लिए मेहनत की और परिस्थितियों से समझौता करने के बजाय उनका सामना किया।
फिर जिंदगी ने एक नया रास्ता खोला। वर्ष 1999 में टिकरवारा ग्राम पंचायत से उन्होंने सरपंच का चुनाव लड़ा और निर्विरोध चुनी गईं। यहीं से उनके सार्वजनिक जीवन की वह शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर उन्हें लगातार बड़ी जिम्मेदारियों तक पहुंचाया। इसके बाद वे जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं और लगातार तीन बार इस जिम्मेदारी को संभाला। राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उनका सरपंच और मंडला जिला पंचायत अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल दर्ज है।
यह सफर हमेशा सीधा नहीं रहा। वर्ष 2013 में उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं मिली। उसी वर्ष उनके पति संजय उइके का भी निधन हो गया। एक तरफ चुनावी हार, दूसरी तरफ जीवनसाथी का साथ छूट जाना, यह किसी भी व्यक्ति के लिए बेहद कठिन समय हो सकता है। लेकिन उन्होंने सार्वजनिक जीवन से खुद को अलग नहीं किया। वे आगे बढ़ती रहीं।
इसके बाद वर्ष 2017 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया। गांव की पगडंडी से शुरू हुआ सफर देश की संसद तक पहुंच चुका था। करीब दस साल बाद 2023 में उन्होंने फिर मंडला विधानसभा से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद उन्हें मध्यप्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी मिली।
आज मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रही संपतिया उइके को देखकर शायद बहुत से लोग केवल पद देखते हैं, लेकिन उनके पुराने दौर को जानने वाले जानते हैं कि इस मुकाम तक पहुंचने के रास्ते में ईंट-भट्ठे की मेहनत भी है, खेत की मजदूरी भी है, नदी पार करके स्कूल जाने की मजबूरी भी है, पढ़ाई के लिए लंबा सफर भी है, चुनावी हार भी है और निजी जीवन का बड़ा दुख भी है।
लोगों ने कहा- समस्या को आज नहीं, उसके कल को देखकर समझती हैं…… क्षेत्र के लोगों से उनके स्वभाव और कार्यकाल को लेकर बात की गई तो उन्होंने कहा कि संपतिया उइके किसी समस्या को केवल तत्काल समाधान के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि उसके आगे के असर को भी समझने की कोशिश करती हैं। लोगों के अनुसार, कोई व्यक्ति किसी काम को लेकर जाता है या किसी विषय पर चर्चा करता है तो वे उसके संभावित अच्छे परिणाम और नुकसान दोनों पहलुओं को समझने के बाद आगे बढ़ती हैं। जरूरत पड़ने पर वरिष्ठ अधिकारियों से फोन पर संपर्क कर समस्या के समाधान के प्रयास भी किए जाते हैं।
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि उनके कार्यकाल से जनता संतुष्ट और खुश है। उनके जीवन की कहानी का सबसे बड़ा संदेश भी शायद यही है कि शुरुआत चाहे कितनी साधारण क्यों न हो, अगर सोच बड़ी हो, मेहनत ईमानदार हो और इंसान मुश्किल समय में भी हिम्मत न छोड़े तो वही संघर्ष एक दिन पहचान बन जाता है।
संपतिया उइके की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें चमक से पहले तपिश है, मंजिल से पहले लंबा रास्ता है और पद से पहले संघर्ष है। यह कहानी सिर्फ एक मंत्री के यहां तक पहुंचने की नहीं, बल्कि उस विश्वास की कहानी है कि इंसान अगर सच में ठान ले, तो जिंदगी उसे वहीं नहीं रोक सकती जहां से उसने शुरुआत की थी…….










