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सहकारी मिल में अफसर नहीं चला सकता मनमानी, पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने विभागीय कार्रवाई की रद्द

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चंडीगढ़
 सहकारी संस्थाओं में सरकारी हिस्सेदारी या किसी अधिकारी का पद उसे संस्था के वैधानिक अधिकारों से अधिक शक्ति नहीं देता। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने सोनीपत सहकारी चीनी मिल के प्रबंध निदेशक के खिलाफ हुई विभागीय कार्रवाई को रद करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा कि किसी सहकारी चीनी मिल के प्रबंध निदेशक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का अधिकार मिल की अपनी प्रबंधन समिति के पास है। केवल उपयुक्त पद पर बैठे अधिकारी या हरियाणा राज्य सहकारी चीनी मिल संघ के प्रबंध निदेशक के पत्र के आधार पर ऐसी कार्रवाई नहीं की जा सकती।

मामला सोनीपत सहकारी चीनी मिल के तत्कालीन प्रबंध निदेशक अश्वनी कुमार से जुड़ा है। वह हरियाणा सिविल सेवा के अधिकारी हैं और तीन सितंबर 2019 को उन्हें मिल का प्रबंध निदेशक नियुक्त किया गया था।

मिल के विस्तार से जुड़ी एक परियोजना में ठेकेदार को भुगतान किए जाने के बाद तकनीकी सलाहकार ने काम और उपकरणों की आपूर्ति को लेकर आपत्तियां उठाई थीं। इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू हुई।

अश्वनी कुमार को 13 फरवरी 2023 को आरोपपत्र जारी किया गया। विभागीय जांच पूरी होने के बाद उन पर 25 जुलाई 2025 को अनिवार्य सेवानिवृत्ति की बड़ी सजा लगा दी गई। आरोप था कि काम में कमियां सामने आने और सक्षम अधिकारियों के निर्देशों के बावजूद उन्होंने ठेकेदार को भुगतान जारी कर दिया, जिससे सहकारी संस्था को आर्थिक नुकसान हुआ।

अश्वनी कुमार ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का अधिकार उपयुक्त प्रबंधन समिति के पास था, लेकिन ऐसा कोई प्रस्ताव रिकॉर्ड में नहीं है।

हाई कोर्ट ने हरियाणा सहकारी समितियां अधिनियम की धारा 25, 31 और 39 तथा संबंधित उपनियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि सहकारी संस्था की अंतिम सत्ता उसके सदस्यों की सामान्य सभा में निहित होती है और संस्था का संचालन उसके निदेशक मंडल के माध्यम से होता है। प्रबंध निदेशक भी समिति के नियंत्रण और अधीक्षण में काम करता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हरियाणा राज्य सहकारी चीनी मिल संघ और सोनीपत सहकारी चीनी मिल दो अलग-अलग सहकारी संस्थाएं हैं। शुगरफेड सदस्य मिलों को सलाह, तकनीकी सहायता और मार्गदर्शन दे सकता है, लेकिन उसके प्रबंध निदेशक को किसी सदस्य चीनी मिल के प्रबंध निदेशक पर अनुशासनात्मक नियंत्रण हासिल नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि उपायुक्त यदि पदेन अध्यक्ष भी हों, तब भी अध्यक्ष का पद उन्हें प्रबंधन समिति की सामूहिक शक्तियां अकेले इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं देता। रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं मिला, जिसमें मिल की प्रबंधन समिति ने भुगतान
रोकने या प्रबंध निदेशक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्णय लिया हो।

हाई कोर्ट ने माना कि कार्रवाई की पूरी नींव ही अधिकार क्षेत्र की गलती पर आधारित थी। अदालत ने 25 जुलाई 2025 का अनिवार्य सेवानिवृत्ति आदेश और उससे जुड़ी पूरी विभागीय कार्रवाई रद कर दी। अश्वनी कुमार को कानून के अनुसार सभी परिणामी सेवा लाभ देने के भी निर्देश दिए गए। फैसला 20 अगस्त 2026 को सुनाया गया।ो

 

Aditya
Author: Aditya

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