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हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को लगाई फटकार, बोले- भत्ते से ज्यादा खर्च मुकदमे पर कर दिया

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चंडीगढ़.

महज 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता (टीए) बिल को लेकर शुरू हुआ विवाद 19 वर्ष तक अदालतों में चलता रहा, लेकिन आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की नियमित द्वितीय अपील को खारिज करते हुए इस लंबे कानूनी विवाद पर विराम लगा दिया।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मूल वाद की राशि 25 हजार रुपये से कम हो तो सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 102 के तहत नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं होती। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने यह फैसला हरियाणा सरकार और उसके अधिकारियों द्वारा दायर अपील पर सुनाया। मामले की शुरुआत उस समय हुई जब रोहतक के ओपी खन्ना ने अपने लंबित टीए बिलों के भुगतान के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया। रिकॉर्ड के अनुसार दिसंबर 1999 से अप्रैल 2002 के बीच विभिन्न सरकारी दौरों से संबंधित 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता बिलों का भुगतान नहीं किया गया था। खन्ना ने दावा किया कि बिलों का भुगतान अनुचित रूप से रोका गया है और उन्होंने राशि के साथ ब्याज की भी मांग की।

दूसरी ओर हरियाणा सरकार का पक्ष था कि संबंधित टीए बिलों को बजट की अनुपलब्धता तथा स्थानीय यात्रा भत्ता और किलोमीटर संबंधी दावों पर उठाई गई आपत्तियों के कारण रोका गया था। विभाग ने यह भी कहा कि मामले को उद्योग निदेशक, हरियाणा के पास स्पष्टीकरण और मार्गदर्शन के लिए भेजा गया था तथा उठाई गई आपत्तियों की जानकारी कर्मचारी को दे दी गई थी। वर्ष 2006 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन), रोहतक ने ओपी खन्ना का मुकदमा खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने जिला जज, रोहतक की अदालत में अपील दायर की। प्रथम अपीलीय अदालत ने 1 फरवरी 2007 को निचली अदालत का फैसला पलटते हुए खन्ना के पक्ष में निर्णय दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए हरियाणा सरकार ने हाई कोर्ट में नियमित द्वितीय अपील दाखिल कर दी।

सरकार की ओर से दलील दी गई कि चूंकि मूल विवादित राशि 10 हजार रुपये से कम थी, इसलिए प्रथम अपील ही सुनवाई योग्य नहीं थी। वहीं न्याय मित्र अंकुर मित्तल ने अदालत को बताया कि सीपीसी की धारा 102 स्पष्ट रूप से कहती है कि 25 हजार रुपये से कम राशि वाले मामलों में दूसरी अपील नहीं की जा सकती। इसलिए सरकार की यह अपील प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार्य है। हाई कोर्ट ने सरकारी विभागों द्वारा बेहद छोटी रकम के मामलों में वर्षों तक मुकदमेबाजी करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कई बार सरकारी विभाग विवादित राशि से कई गुना अधिक रकम मुकदमेबाजी पर खर्च कर देते हैं। इससे न केवल सार्वजनिक धन की बर्बादी होती है बल्कि न्यायालयों का बहुमूल्य समय भी ऐसे मामलों में खर्च होता है।

जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि मूल वाद की राशि मात्र 7,299 रुपये थी, जो 25 हजार रुपये की वैधानिक सीमा से काफी कम है। ऐसे में सीपीसी की धारा 102 के स्पष्ट परविधान के कारण नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं है। अदालत ने इसी आधार पर हरियाणा सरकार की अपील को खारिज कर दिया।

Aditya
Author: Aditya

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