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पंजाब की राजनीति में बड़ा ट्विस्ट! BJP-अकाली दल गठबंधन की अटकलें तेज

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चंडीगढ़.

पंजाब विधानसभा चुनाव में अभी करीब छह महीने का समय बाकी है, लेकिन सियासी दलों ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि कौन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा, बल्कि यह होगा कि कौन किसके साथ खड़ा होगा।

15 सितंबर के बाद पंजाब की राजनीति में गठबंधन और दल-बदल को लेकर तस्वीर तेजी से साफ होने की उम्मीद है। खासतौर पर भाजपा की रणनीति पर सबकी नजर रहेगी, क्योंकि पार्टी को अपने संभावित चुनावी साथी को लेकर अहम फैसला करना है। भाजपा 15 सितंबर से पंजाब में नशा विरोधी रैलियों का सिलसिला शुरू करने जा रही है। इन रैलियों को पार्टी की चुनावी तैयारी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रैलियों में मिलने वाला जनसमर्थन भाजपा के लिए पंजाब की राजनीतिक जमीन का संकेतक होगा। पार्टी यह परखना चाहेगी कि नशे के मुद्दे पर उसका अभियान जनता के बीच कितना असर पैदा कर रहा है और संगठन चुनावी माहौल बनाने में कितना सक्षम है।

पंजाब प्रभारी दो दिवसीय दौर पर 
इसी बीच भाजपा के नवनियुक्त पंजाब प्रभारी डाॅ. सतीश पूनिया 31 अगस्त से दो दिवसीय पंजाब दौरे पर पहुंच रहे हैं। दौरे के दौरान प्रदेश नेतृत्व के साथ-साथ संगठन के विभिन्न स्तरों पर बैठकें होंगी। इन बैठकों में चुनावी तैयारियों, संगठन की स्थिति और आगामी रणनीति पर चर्चा होगी। साथ ही संभावित गठबंधन को लेकर पंजाब भाजपा के नेताओं से फीडबैक लिए जाने की संभावना है।

भाजपा के सामने अकाली दल को लेकर सबसे बड़ा पेच
भाजपा के लिए सबसे अहम सवाल शिरोमणि अकाली दल को लेकर है। पार्टी के सामने दो रास्ते दिखाई दे रहे हैं। पहला, सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल के साथ दोबारा तालमेल का रास्ता और दूसरा, ज्ञानी हरप्रीत सिंह के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) के साथ नया राजनीतिक समीकरण। दोनों विकल्पों के अपने अलग राजनीतिक मायने हैं। यदि भाजपा किसी एक अकाली धड़े के साथ गठबंधन करती है तो कई विधानसभा सीटों पर वोटों का गणित बदल सकता है। इस संभावित गठबंधन में बसपा की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। ऐसे में भाजपा के लिए गठबंधन का फैसला केवल सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखकर किया जाने वाला फैसला होगा।

कांग्रेस और आप अलग हुए तो बढ़ेगा रोमांच
वहीं कांग्रेस और आप के अलग-अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में पंजाब का चुनावी मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है। शिरोमणि अकाली दल भी यदि अलग मैदान में रहता है तो कई सीटों पर त्रिकोणीय और बहुकोणीय मुकाबले बन सकते हैं। ऐसे में कुछ सीटों पर कुछ हजार वोटों का अंतर भी परिणाम बदल सकता है। चुनाव से पहले दल-बदल भी सियासी तस्वीर को प्रभावित कर सकता है। अलग-अलग दलों के असंतुष्ट नेता अपने राजनीतिक भविष्य को देखते हुए पाला बदल सकते हैं। ऐसे नेताओं पर सभी प्रमुख दलों की नजर रहेगी।

गठबंधन और फेरबदल से तय होगी दिशा
इसलिए 15 सितंबर के बाद पंजाब की राजनीति में रैलियों से ज्यादा नजर गठबंधन की चाल और नेताओं की राजनीतिक पारी बदलने पर रहेगी। भाजपा के नशा विरोधी अभियान को मिलने वाला जनसमर्थन डाॅ. सतीश पूनिया की बैठकों से मिलने वाला फीडबैक और अकाली दल को लेकर पार्टी का फैसला आने वाले चुनावी रण की दिशा तय कर सकता है। फिलहाल पंजाब की सियासत में तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि अगले कुछ महीने गठबंधन, दल-बदल और वोटों के बंटवारे के लिहाज से बेहद अहम रहने वाले हैं।

Aditya
Author: Aditya

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