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स्ट्रेंथ का विरोधाभास: हर गुण स्थिति के अनुसार ताकत भी और कमजोरी भी बन सकता है

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इस विचार का अर्थ यह है कि कोई भी गुण अपने आप में न तो पूर्णतः अच्छा होता है और न ही बुरा, उसका मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि आप उसे किस हालात में और किस तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं. इसे मनोविज्ञान की भाषा में स्ट्रेंथ का विरोधाभास (The Paradox of Strengths) कहा जाता है.

इसे समझने के लिए क्रिकेट की दुनिया के दिग्गज हर्ष भोगले का उदाहरण बहुत सटीक है. हर्ष भोगले क्रिकेट कमेंट्री की दुनिया का एक बहुत बड़ा नाम हैं.  उन्हें क्रिकेट की आवाज कहा जाता है.  वे अपनी शानदार कमेंट्री के लिए बेस्ट स्पोर्ट्स प्रेजेंटर के प्रतिष्ठित पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुके हैं.

खेल का मैदान  हो या जिंदगी का कोई भी दौर , हमेशा तर्क काम  नहीं आते, कभी-कभी स्थिति ऐसी होती है जहां  सिर्फ ठंडे तर्क नहीं, बल्कि जुनून और जोश की उम्मीद की जाती हैं.

मान लीजिए, जब पूरा देश किसी रोमांचक मैच में अपनी टीम के लिए भावुक हो रहा हो, उस समय अगर कोई बहुत ज्यादा तार्किक बातें करे, तो कुछ लोगों को उनकी यही निष्पक्षता ठंडी या बे-मन वाली लग सकती है.  यहां उनकी वही खूबी (तार्किकता), जो उनकी सबसे बड़ी ताकत है, उस विशेष स्थिति में एक चुनौती बन जाती है.

इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी यह खूबी खराब है या उन्हें बदलने की जरूरत है. इसका सीधा सा मतलब यह है कि दुनिया में कोई भी गुण हर परिस्थिति के लिए एक समान रूप से सही नहीं होता. जो व्यक्ति यह समझ जाता है कि उसे अपनी कौन सी ताकत का इस्तेमाल कब और कितनी मात्रा में करना है, वही वास्तव में समझदार है. सफलता का रहस्य गुणों में नहीं, बल्कि संदर्भ की समझ (Understanding the Context) में छिपा है.

Aditya
Author: Aditya

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