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पाटिल के बूथ मैनेजमेंट मॉडल पर BJP की नजर, पार्टी को मिल सकता फायदा; अलग समीकरणों में उतारना मुश्किल

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चंडीगढ़ 

 पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। भाजपा भी राज्य में अपने संगठन और राजनीतिक आधार को विस्तार देने की कोशिश में है। इसी बीच गुजरात भाजपा के संगठनात्मक मॉडल के लिए चर्चित सीआर पाटिल की कार्यशैली पंजाब के संदर्भ में चर्चा में है।

हालांकि यह देखना अभी बाकी है कि गुजरात में कारगर रहा उनका बूथ आधारित चुनावी प्रबंधन पंजाब की अलग राजनीतिक परिस्थितियों में कितना उपयोगी साबित होता है। पाटिल की चुनावी शैली में बड़े आयोजनों के साथ-साथ बूथ स्तर के संगठन पर विशेष जोर रहा है। 

मतदाता सूची के प्रत्येक पन्ने से कार्यकर्ता को जोड़ना, बूथ समितियों को सक्रिय रखना, कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण और मतदाताओं से लगातार संपर्क इस मॉडल के प्रमुख हिस्से माने जाते हैं।इसका उद्देश्य चुनावी अभियान को केवल रैलियों और बड़े नेताओं के दौरों तक सीमित रखने के बजाय संगठन को निचले स्तर तक सक्रिय रखना है। 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 182 में से 156 सीटें जीती थीं। उस समय पाटिल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे। पंजाब में भाजपा के सामने चुनौती गुजरात से अलग है। 

 117 सदस्यीय विधानसभा में ग्रामीण इलाकों, खासकर मालवा क्षेत्र का चुनावी महत्व बड़ा है। पार्टी को यहां अपने संगठन का विस्तार करने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने की चुनौती है। शहरों में मौजूद आधार को मजबूत करना भी उसके लिए समान रूप से महत्वपूर्ण होगा। 
 
भाजपा के लिए उपयोगी हो सकती है रणनीति
ऐसे में बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने और मतदाता संपर्क का व्यवस्थित नेटवर्क बनाने की रणनीति भाजपा के लिए उपयोगी हो सकती है। लेकिन इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे पंजाब के स्थानीय राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों के अनुरूप किस तरह लागू किया जाता है।  

यहां आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला, अकाली दल की ऐतिहासिक भूमिका, ग्रामीण-शहरी विभाजन और सिख मतदाताओं से जुड़े संवेदनशील मुद्दे चुनावी रणनीति को अलग स्वरूप देते हैं। 

Aditya
Author: Aditya

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