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वीरगंज समेत नेपाल के तराई क्षेत्र में बढ़े मस्जिद-मदरसे, सुरक्षा और जनसांख्यिकी को लेकर चिंता

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मुजफ्फरपुर
भारत के पूर्वी चंपारण के रक्सौल सीमा से सटे नेपाल के प्रमुख व्यापारिक शहरों में से एक वीरगंज। यहां के छपकैया में कुछ वर्ष पहले तक दो मस्जिदें थीं। अब इनकी संख्या बढ़कर सात हो गई है।

सिर्फ छपकैया ही नहीं, उत्तर बिहार से जुड़े पूर्वी चंपारण, मधुबनी, सीतामढ़ी व पश्चिम चंपारण से सटे नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में मदरसों और मस्जिदों की संख्या असामान्य रूप से बढ़ी है।

नेपाल जनता पार्टी की राष्ट्रीय कमेटी के पूर्व सदस्य पारस द्विवेदी का कहना है कि देश में हिंदू और मुसलमानों के बीच हमेशा से भाईचारे का संबंध रहा है, लेकिन मधेश आंदोलन के बाद प्रदान की गई नागरिकता में विदेशी घुसपैठियों के कारण तराई में धार्मिक सुरक्षा चुनौती बनती जा रही है।

भारत-नेपाल की 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा से घुसपैठ बढ़ी है। बांग्लादेश, पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों से आने वाले कट्टरपंथियों के लिए नेपाल के गेस्ट हाउस, मदरसे और मस्जिदें सुरक्षित आश्रय स्थल के रूप में इस्तेमाल हो रही हैं।

एक गोपनीय सुरक्षा रिपोर्ट का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि पाकिस्तान और तुर्की के सहयोग से मस्जिदों, मदरसों, अनाथालयों और इस्लामिक सांस्कृतिक केंद्रों का तेजी से विस्तार हो रहा है।

तराई में वर्ष 2018 में 760 मस्जिदें थीं, जो 2021 में बढ़कर 1,000 से अधिक हो गईं। इसी तरह मदरसों की संख्या भी 508 से बढ़कर 645 हो गई।

पारस द्विवेदी कहते हैं कि त्रिभुवन विश्वविद्यालय की ओर से 2019 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार नेपाल में 960 पंजीकृत और चार से पांच हजार तक अवैध मदरसे संचालित हो रहे थे।

2025 के नेपाल के शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पंजीकृत मदरसों की संख्या बढ़कर 1,300 हो गई है। इससे साफ है कि वैध और अवैध मदरसों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

नेपाल के राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक धर्मेंद्र झा कहते हैं कि ये सच है कि सीमावर्ती क्षेत्र में जनसांख्यिकी तेजी से बदली है। गांवों में मस्जिद और मदरसों की संख्या खूब बढ़ी है।

पिछले कुछ वर्षों में नेपाल में मतांतरण एक प्रमुख समस्या बनकर उभरी है। इसका सीधा प्रभाव हिंदू गरीब आबादी पर पड़ रहा है। इस पर नेपाल सरकार को गंभीर होने की आवश्यकता है।

 

Aditya
Author: Aditya

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