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विभाजन के बाद बसा गांधी कैंप, 33 गज के घरों से गढ़ी नई पहचान

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रोहतक
मैं गांधी कैंप हूं। आज मेरे आसपास पक्के मकान, बाजार और शहर की रफ्तार दिखाई देती है, लेकिन मेरी कहानी उन परिवारों से शुरू होती है जो वर्ष 1947 में विभाजन के बाद पाकिस्तान से उजड़कर यहां पहुंचे थे। उनके पास अपना पुराना घर नहीं था, भविष्य की कोई निश्चित तस्वीर नहीं थी। शुरुआत तंबुओं और राहत शिविरों से हुई। काहनौर में जमीन आवंटित होने के बाद कई परिवार वर्ष 1960 में रोहतक के जवाहर नगर और मेरे हिस्से में आकर बस गए। फिर 33-33 गज के पक्के मकान बनने लगे। इन छोटी-छोटी छतों के नीचे लोगों ने सिर्फ घर नहीं बसाए, बल्कि अपनी अगली पीढ़ियों का भविष्य भी गढ़ना शुरू किया।

तंबुओं की जगह मकानों ने ली
मैंने अपने लोगों को अभाव से जूझते देखा है। शुरुआती दिनों की अस्थायी जिंदगी धीरे-धीरे स्थायी ठिकाने में बदली। तंबुओं की जगह पक्के मकान खड़े हुए। इन्हीं घरों के आसपास बाजार विकसित हुआ और परिवारों की मेहनत ने मेरी पहचान बदलनी शुरू कर दी। आज के घने बसे इलाके के पीछे उन्हीं परिवारों की लंबी मेहनत है, जिन्होंने उजड़ने के बाद फिर से खड़ा होना सीखा।

जब बांस का पुल शहर की राह था
गांधी कैंप बाजार के पास रोहतक-पानीपत-गोहाना रेलवे लाइन के निकट कभी बांस का पुल था। वर्ष 1962 में इस मार्ग पर रेलगाड़ी चलनी शुरू हुई। हिसार रोड के पास पुराना बस अड्डा था। जहां आज डीएलएफ क्षेत्र दिखाई देता है, वहां तब गिने-चुने मकान थे। मेरे आसपास का शहर धीरे-धीरे फैल रहा था और मैं भी उसके साथ बदल रहा था।

मटकों में आता था पानी, चारों ओर दिखते थे बाग
पूर्व पार्षद अशोक खुराना बताते हैं कि अशोका चौक के पास जनस्वास्थ्य विभाग के जलघर से पक्की नालियों के जरिए पानी आता था और लोग मटकों में भरकर ले जाते थे। सर्कुलर रोड के दोनों ओर अमरूद के बाग थे।

पुलिसकर्मी साइकिल से गश्त करते थे और पगड़ी उनकी वर्दी का हिस्सा थी। आज का सेक्टर-1 और सेक्टर-14 तब जंगल जैसे थे। दिल्ली रोड भी महज नौ-दस फीट चौड़ी थी। मैंने उसी छोटे रोहतक को फैलते देखा है, जिसकी नई पहचान मेरी गलियों में बसे उन विस्थापित परिवारों की मेहनत ने गढ़ी।

Aditya
Author: Aditya

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