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बनारस में अंग्रेजों का दमन, 23 जगह चली गोलियां और 550 लोग जेल भेजे गए

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वाराणसी
भारत छोड़ो आंदोलन के बाद 1945 में वाराणसी जिला और शहर कांग्रेस कमेटी ने ब्रिटिश हुकूमत की क्रूरता की जांच के लिए एक समिति गठित की थी। अब्दुल अलीम समिति के अध्यक्ष बनाए गए, जबकि राज नारायण सिंह, सीता राम जौहरी सदस्य और रघुनाथ सिंह समिति के मंत्री थे।

समिति ने आंदोलन के दौरान वाराणसी में हुए दमन और अत्याचार की घटनाओं की जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। रिपोर्ट के अनुसार, भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वाराणसी में 14 स्थानों पर लाठीचार्ज किया गया था। पुलिस ने 23 स्थानों पर गोलियां चलाई थीं, जिसमें 18 लोग शहीद और 178 घायल हुए थे। हिंसा में तीन पुलिसकर्मियों की भी मौत हुई और तीन घायल हुए। 73 लोगों को पेड़ों से बांधकर बुरी तरह पीटा गया। पांच स्थानों पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न हुआ।

एक घटना में रेलवे के वेटिंग रूम में मां और बेटी के साथ रेप हुआ था। एक महिला को प्रसव के दौरान घर से बाहर निकाल दिया गया और उसने खेत में ही बच्चे को जन्म दिया। चार मकान ढहा दिए गए और आठ मकानों में आग लगा दी गई थी।
15 को कालापानी, 306 नजरबंद, 550 गए जेल दमन की कार्रवाई के दौरान व्यक्तियों और गांवों पर सामूहिक रूप से 1,86,819 रुपये का जुर्माना लगाया गया। 117 लोगों को जिला बदर, 306 लोगों को नजरबंद और 550 लोगों को जेल की सजा दी गई। 15 लोगों को काले पानी की सजा सुनाई गई और तीन लोगों को फंदे पर लटकाने का उल्लेख समिति की रिपोर्ट में मिलता है।

रिपोर्ट का गहन अध्ययन करने वाले अधिवक्ता नित्यानंद राय बताते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान काशी में स्वतंत्रता की लड़ाई केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं थी, बल्कि आम नागरिकों ने भी ब्रिटिश दमन और अत्याचार का सामना करते हुए आजादी की लड़ाई में अपनी भूमिका निभाई थी।

गिरफ्तारी से बचने वालों के लिए काशी सुरक्षित पनाहगाह भारत छोड़ो आंदोलन के दिनों में वाराणसी सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। हजारीबाग जेल से फरार होने के बाद स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण भी काशी पहुंचे थे। बीएचयू में बिताया। इसके बाद वे राय सत्यव्रत के लहरतारा बाग में भी रहे थे।  

तीन जगह चलीं गोलियां, बलिदानियों के खून से लाल हुई धरती
13 अगस्त का दिन भी बनारस के स्वतंत्रता संघर्ष में बेहद उग्र रहा था। आंदोलनकारियों पर तीन स्थानों पर पुलिस ने गोलियां चलाई थीं। दशाश्वमेध में पुलिस ने 26 राउंड गोलियां चलाई, जिसमें चार आंदोलनकारियों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दर्जनों लोग घायल हुए थे। आंदोलनकारियों ने बनारस सिटी, सारनाथ और रजवारी सहित कई रेलवे स्टेशनों पर आगजनी की। बेचूपुर, शिवनाथपुर, राजातालाब और अहरौरा रेलवे स्टेशनों पर तोड़फोड़ की गई। चौकाघाट स्थित आबकारी गोदाम को भी आग के हवाले कर दिया गया। लगातार बढ़ते आंदोलन और पुलिस कार्रवाई से पूरा शहर तनाव की चपेट में था। इसके पूर्व आंदोलन के प्रभाव से काशी हिंदू विश्वविद्यालय सहित अन्य शिक्षण संस्थानों को 14 सितंबर तक बंद कर दिया गया। काशी विद्यापीठ में पुलिस ने 9 अगस्त को ही ताला जड़ दिया था। बीएचयू के उपकुलपति डॉ. राधाकृष्णन ने छात्रों से घर लौटने की अपील की। हरदत्तपुर और लोहता के बीच रेलवे पटरी उखाड़ दी गई। मुगलसराय स्टेशन और रेलवे के नियामताबाद गोदाम पर तिरंगा फहराया गया। इन दिनों में बनारस केवल आंदोलन का केंद्र नहीं रहा, बल्कि यहां से उठी प्रतिरोध की लहर ने पूरे पूर्वांचल को अपनी चपेट में ले लिया। कचहरी और लाल भवन पर फहराया गया तिरंगा उस दौर में अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती का प्रतीक बन गया।

Aditya
Author: Aditya

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