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शब्दों का प्रदूषण: आने वाली पीढ़ी के संस्कारों पर सबसे बड़ा संकट – मंजरी…..

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लेखिका: मंजरी सिंह…

समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक या तकनीकी प्रगति से नहीं होती, बल्कि उसकी भाषा, संस्कृति और संवाद की मर्यादा से होती है। जिस समाज की भाषा जितनी संयमित और संस्कारित होती है, उसका भविष्य उतना ही सशक्त होता है। आज दुर्भाग्य से सार्वजनिक जीवन, सोशल मीडिया और राजनीतिक विमर्श में शब्दों की गरिमा लगातार गिरती जा रही है। असहमति और विरोध के नाम पर अपशब्दों का प्रयोग सामान्य होता जा रहा है, जो समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते और सुनते हैं। यदि घर, समाज और सार्वजनिक मंचों पर कटु भाषा, अपमान और गाली-गलौज सामान्य बना दी जाएगी, तो आने वाली पीढ़ी भी उसे ही संवाद का माध्यम मानने लगेगी। ऐसे में प्रश्न केवल भाषा का नहीं, बल्कि संस्कारों और चरित्र निर्माण का भी है।
लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन विचारों की लड़ाई कभी भी शब्दों की मर्यादा को नहीं तोड़नी चाहिए। जब संवाद की जगह अपमान ले लेता है, तब समाज में संवेदनशीलता कमजोर होने लगती है। जिस प्रकार पर्यावरण प्रदूषण हमारे शरीर को प्रभावित करता है, उसी प्रकार शब्दों का प्रदूषण मन, विचार और व्यक्तित्व को विषाक्त कर देता है।
आज आवश्यकता बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा देने की नहीं, बल्कि उन्हें शालीन भाषा और सकारात्मक संवाद का वातावरण देने की है। माता-पिता, शिक्षक, जनप्रतिनिधि और समाज का प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक यह याद रखे कि उसके बोले गए शब्द किसी बच्चे के व्यक्तित्व की नींव बन सकते हैं।
यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी संस्कारित, संवेदनशील और जिम्मेदार बने, तो परिवर्तन की शुरुआत अपने शब्दों से करनी होगी। क्योंकि शब्द केवल ध्वनि नहीं, संस्कृति होते हैं,
शब्द केवल वाक्य नहीं, व्यक्तित्व गढ़ते हैं। स्वच्छ शब्द ही स्वच्छ समाज और सुरक्षित भविष्य की सबसे मजबूत नींव हैं।
लेखिका: मंजरी सिंह…..
Amit Mishra
Author: Amit Mishra

Group Editor, Rewanchal Roshni News Group

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