Edition

राजस्थान में ऊंट संरक्षण की नई मुहिम, दूध और उत्पादों से बढ़ेगी पशुपालकों की आय

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

जयपुर
रेगिस्तान का जहाज कहे जाने वाले ऊंटों को बचाने के लिए अब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने तैयार अनूठा मास्टर प्लान तैयार किया है. 'रेगिस्तान के जहाज' को संरक्षित करने के साथ ही मरुस्थलीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. वहीं, इसके साथ ही ऊंटों के दूध से तैयार होने वाले विभिन्न प्रोडक्ट को भी महत्व मिलेगा. पश्चिम राजस्थान में किसी सरकारी संस्थान की ओर से संभवतः यह अब तक का पहला बड़ा प्रयास है.

ऊंटों की संख्या में बीते कुछ वर्षों में गिरावट
पश्चिमी राजस्थान में लंबे समय तक आजीविका के मुख्य साधन रहे ऊंटों की संख्या में बीते कुछ वर्षों में काफी अधिक गिरावट देखी गई है. बदलते खेती और परिवहन में आधुनिक वाहनों के उपयोग और चारागाह की लगातार घटती संख्या से न सिर्फ ऊंटों पर यह संकट मंडराया, बल्कि मरुस्थलीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर भी इससे काफी प्रभावित हुई है. इसी को देखते हुए एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के कुलगुरु वीरेंद्र सिंह जेतावत की पहल पर यह महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है.

इसकी शुरुआत विश्वविद्यालय के ही कृषि विज्ञान केंद्र गुड़ामालानी से शुरू की गई है. इसके तहत न सिर्फ स्थानीय लोगों को जागरूक किया गया, बल्कि विभिन्न प्रयासों के तहत ऊंटों के बेहतर संरक्षण और पशुपालकों के साथ ही चारागाह के पुनरुत्थान को लेकर भी यह महत्वपूर्ण प्रयास बताया जा रहा है.

ऊंटपालकों को सरकारी स्कीम से जोड़ने पर भी जोर
एनडीटीवी से खास बातचीत करते हुए इस प्रोजेक्ट के डायरेक्टर और एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. प्रदीप पगाड़िया ने बताया कि निश्चित रूप से इस दिशा में कृषि विज्ञान केंद्र गुड़ामालानी से इसकी शुरुआत हुई है. राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र बीकानेर के सहयोग से विभिन्न प्रोजेक्ट के तहत चारागाह जमीन को विकसित किया जाएगा. इसके साथ ही ऊंटपालकों में जागरूकता बढ़ाकर सरकार की ओर से विभिन्न सरकारी योजनाओं से भी इसको जोड़ा जाएगा.

नए प्लेटफॉर्म से आय में भी होगी बढ़ोतरी
कृषि विज्ञान केंद्र गुड़ामालानी की ओर से पौष्टिक तत्वों से परपूर सुपरफूड ऊंटनी के दूध का संग्रहण केंद्र बनाकर व उसका मूल्य संवर्धन कर विभिन्न उत्पादों को भी बनाया जाएगा. इससे न सिर्फ ऊंटपालकों को एक नया प्लेटफॉर्म मिलेगा, बल्कि केंद्र के सहयोग से मार्केटिंग होने से उनकी आय में भी काफी बढ़ोतरी होगी. इसके अतिरिक्त ऊंट के बालों से बने उत्पादों को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी पहचान दिलाने के लिए सहायता भी प्रदान की जाएगी, जहां अगर इसके मुख्य उद्देश्य की बात करें, तो बदलते जलवायु परिवर्तन के दौर में ग्रामीण आजीविका को सुरक्षित करने, मरुस्थलीय इकोसिस्टम को बचाने व ऊंटनी के दूध जैसे सुपरफूड के माध्यम से नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था को खड़ा करने का यह मिशन है.

Aditya
Author: Aditya

Share करें

✓ Link copy हो गया!

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!