मरीज के परिजनों को पीटते दिखे डॉक्टर एवं स्टाफ..
सतना। शहर के पन्ना नाका स्थित पूजा हॉस्पिटल एक गंभीर विवाद के बाद चर्चा में है। मरीज के बेटे देवेंद्र सिंह पटेल ने अस्पताल के न्यूरो सर्जन डॉ. नितिन कुलश्रेष्ठ, अस्पताल प्रबंधन और स्टाफ पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनके पिता को पूरे दिन भर्ती रखकर ऑपरेशन का भरोसा दिया गया, लेकिन शाम होते-होते इलाज से इनकार कर दिया गया। इतना ही नहीं, सवाल पूछने पर डॉक्टर के अभद्र व्यवहार और अस्पताल स्टाफ द्वारा महिलाओं से दुर्व्यवहार तथा मारपीट की कोशिश तक के आरोप लगाए गए हैं।
देवेंद्र सिंह पटेल के अनुसार, उनके पिता के सिर में गिरने से गंभीर चोट आई थी और जांच में क्लॉटिंग सामने आई थी। सुबह उन्हें पूजा हॉस्पिटल लाया गया, जहां डॉ. नितिन कुलश्रेष्ठ ने सभी रिपोर्ट देखने के बाद मरीज को भर्ती कर लिया और शाम को ऑपरेशन करने की बात कही। परिवार पूरे दिन ऑपरेशन की उम्मीद में अस्पताल में रुका रहा।
परिजनों का आरोप है कि शाम करीब 6:30 बजे डॉक्टर ने पहले कहा कि आज देर हो गई है और ऑपरेशन अगले दिन होगा। इसी दौरान जब परिवार ने रिपोर्ट में प्लेटलेट्स कम होने की बात पूछी तो डॉक्टर ने अचानक कहा कि यहां ऑपरेशन संभव नहीं है और मरीज को बाहर ले जाना पड़ेगा। परिजनों का कहना है कि यदि अस्पताल में इलाज संभव नहीं था तो दोपहर ही रेफर क्यों नहीं किया गया और मरीज को 6-7 घंटे तक भर्ती रखकर उसका कीमती समय क्यों बर्बाद किया गया?
मरीज के बेटे का आरोप है कि इस पर सवाल पूछने पर डॉ. नितिन कुलश्रेष्ठ नाराज हो गए और अभद्र भाषा का प्रयोग करने लगे। इसी बीच जब उनके छोटे भाई की पत्नी ने गुस्से मे कहा कि यदि यहां इलाज संभव नहीं है तो वे मरीज को बाहर ले जाएंगे, तो अस्पताल प्रबंधन से जुड़े कुछ लोग मौके पर पहुंचे और महिला से भी अभद्र व्यवहार किया। विरोध करने पर अस्पताल स्टाफ कथित रूप से मारपीट पर उतारू हो गया, हालांकि परिवार ने किसी तरह मामला शांत कराया।
देवेंद्र सिंह पटेल ने आरोप लगाया कि उनके पिता की गंभीर स्थिति के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने संवेदनशीलता नहीं दिखाई। उनका कहना है कि डॉक्टर और स्टाफ का रवैया बेहद गैर-जिम्मेदाराना था, जिसके कारण उन्हें मजबूर होकर अपने पिता को बेहतर इलाज के लिए नागपुर ले जाना पड़ रहा है।
पीड़ित परिवार ने पिता के इलाज के बाद पूरे मामले की शिकायत स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से करने की बात कही है। उनका कहना है कि यदि निजी अस्पतालों में भी मरीजों के साथ ऐसा व्यवहार होगा, तो आम जनता आखिर किस पर भरोसा करेगी?
बड़ा सवाल यह हैं की यदि अस्पताल में ऑपरेशन संभव नहीं था, तो मरीज को भर्ती क्यों किया गया? यदि मरीज की हालत बिगड़ जाती या जान चली जाती, तो जिम्मेदारी किसकी होती?
क्या सवाल पूछना मरीज और उसके परिजनों का अधिकार नहीं है? और यदि महिलाओं से अभद्रता तथा स्टाफ द्वारा दुर्व्यवहार के आरोप सही हैं, तो क्या ऐसे अस्पतालों की निष्पक्ष जांच नहीं होनी चाहिए?









