सुविधाएं छिनती रहीं, नेता गिनाते रहे उपलब्धियां: सतना की 20 ई-बसें भी गईं, अब जनता पूछ रही- जवाब कौन देगा?………
अमित मिश्रा, भोपाल/सतना…..
सतना। स्मार्ट सिटी बनने का सपना देख रहे सतना को एक और बड़ा झटका लगा है। शहर के लिए स्वीकृत 20 इलेक्ट्रिक बसों का आवंटन निरस्त कर उन्हें भोपाल और इंदौर भेज दिया गया। जिस परियोजना को शहर के विकास की बड़ी उपलब्धि बताकर जनप्रतिनिधियों ने खूब वाहवाही लूटी थी, वह सुविधा शुरू होने से पहले ही सतना के हाथ से निकल गई। अब शहर में सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सतना हर बार विकास की दौड़ में पीछे क्यों रह जाता है और इसके लिए जवाबदेह कौन है?
प्रदेश के कई शहर बीते वर्षों में आधुनिक सार्वजनिक परिवहन, मेट्रो, इलेक्ट्रिक बसों और स्मार्ट सुविधाओं के साथ लगातार आगे बढ़ते गए, लेकिन सतना के हिस्से में बार-बार सिर्फ घोषणाएं ही आती रहीं। सुविधाओं का शोर तो खूब मचाया गया, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी कोई निभाता नजर नहीं आया। इलेक्ट्रिक बस सेवा भी इसका ताजा उदाहरण बन गई है।
सबसे बड़ा सवाल जिले के जनप्रतिनिधियों पर उठ रहा है। जिस समय यह बसें स्वीकृत हुई थीं, तब इसे अपनी उपलब्धि बताकर प्रचार किया गया। पुराने और नए बस स्टैंड के बीच संचालन, आसपास के कस्बों तक सेवा विस्तार और प्रदूषण मुक्त परिवहन के बड़े-बड़े दावे किए गए। लेकिन जब परिवहन विभाग ने आवंटन बदलकर बसें भोपाल और इंदौर भेज दीं, तब राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी, सांसद गणेश सिंह, महापौर योगेश ताम्रकार सहित किसी भी जनप्रतिनिधि की ओर से सार्वजनिक विरोध या दबाव की कोई प्रभावी पहल सामने नहीं आई।
शहरवासियों का कहना है कि सतना के साथ यह पहली बार नहीं हुआ है। कई परियोजनाएं पहले घोषित होती हैं, फिर किसी न किसी कारण से ठंडे बस्ते में चली जाती हैं या दूसरे शहरों को स्थानांतरित कर दी जाती हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि सतना केवल घोषणाओं व नेताओं की आपसी खींचाँतानी का शहर बनकर रह गया है।
लोग अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि यदि स्वीकृत सुविधाएं भी सतना से वापस चली जाएं और जनप्रतिनिधि मौन रहें, तो फिर जनता किससे जवाब मांगे?
विकास के नाम पर फोटो, प्रेस विज्ञप्तियां और बधाई संदेश तो खूब जारी होते हैं, लेकिन जब अधिकार और सुविधाएं छिनती हैं, तब जिम्मेदारी लेने वाला कोई नजर नहीं आता। इलेक्ट्रिक बसों का सतना से जाना सिर्फ परिवहन सेवा का नुकसान नहीं, बल्कि जिले की घटती राजनीतिक पकड़ और विकास के प्रति उदासीनता का भी संकेत माना जा रहा है।









