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अच्छी नौकरी, मोटी सैलरी फिर भी डिप्रेशन! ‘बोरआउट’ ने बढ़ाई कर्मचारियों की चिंता

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नई दिल्ली
 अब तक आपने सुना होगा कि ऑफिस में काम का दबाव ज्यादा होने के कारण लोग बर्नआउट का शिकार हो रहे हैं। यानी काम का प्रेशर उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से थका रहा है, लेकिन अब एक दूसरी समस्या सामने आ रही है। 

अब कर्मचारी ऑफिस में बर्नआउट से ज्यादा बोरियत का शिकार हो रहे हैं, जिसे बोरआउट कहते हैं। इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि दफ्तरों में करने के लिए काम नहीं बचा है, बल्कि लोगों को अब उस काम का कोई मकसद नजर नहीं आ रहा है। जब काम में कोई नया चैलेंज नहीं मिलता या वो दिनभर खाली बैठे रहते हैं, तो ये खालीपन उन्हें अंदर से तोड़ने लगता है। 

बाहर से देखने पर सबकुछ बिल्कुल ठीक दिखाई देता है। अच्छी नौकरी, सैलेरी, एसी की हवा और आरामदायक कुर्सी, लेकिन भारी बोरियत की वजह से अंदर ही अंदर कर्मचारियों का आत्मविश्वास डगमगा जाता है। 

बोरआउट कर्मचारियों को कैसे प्रभावित कर रहा है?
इस शब्द का सबसे पहली बार इस्तेमाल यूरोप के एक वर्कप्लेस रिसर्च में किया गया था। इस रिसर्च के अनुसार, लगातार काम कम मिलना, एक ही तरह का काम रोज-रोज करना या अपने स्किन का इस्तेमाल न कर पाना, कर्मचारियों को स्ट्रेस, एंग्जायटी और डिप्रेशन की तरफ धकेल रहा है।

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने बर्नआउट को काम से जुड़े सिंड्रोम के रूप में डिफाइन किया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऑफिस में कोई मकसद न होने की वजह से पैदा होने वाला स्ट्रेस मेंटल हेल्थ के लिए काफी नुकसानेह है। 

बिजी दिखने की मजबूरी
एक रिपोर्ट के अनुसार, कॉर्पोरेट ऑफिसेज में ऐसे कर्मचारियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिन्हें सैलेरी तो अच्छी मिल रही है, लेकिन उनका काम बहुत कम है या काफी बिखरा हुआ है। ऐसे कर्मचारी दिनभर सिर्फ बिजी दिखने की कोशिश करते हैं। मीटिंग्स, ई-मेल और स्क्रीन के सामने खुद को बेकार महसूस करना ही बोरआउट की असली वजह है। 

वर्कप्लेस से जुड़ी रिपोर्ट्स बताती हैं कि कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा अपने काम से कनेक्टेड महसूस नहीं करता। काम में कोई चैलेंज न होने से स्ट्रेस, आत्मसम्मान में कमी और डिप्रेशन जैसी समस्याएं पैदा होती है, क्योंकि कर्मचारियों को अपनी प्रोडक्टिविटी और काबिलियत पर शक होने लगता है। 

आईटी, बैंकिंग और सरकारी दफ्तरों पर सबसे ज्यादा असर
ग्लोबल सर्वे और एचआर ट्रेंड्स के मुताबिक, दुनिया भर के करीब 15 से 20 प्रतिशत कर्मचारी किसी न किसी स्तर पर इस बोरियत का सामना कर रहे हैं। खासतौर से आईटी, बैंकिंग और सरकारी दफ्तरों में यह समस्या बहुत ज्यादा देखी जा रही है, क्योंकि इन जगहों पर एक ही काम को बार-बार दोहराने का चलन ज्यादा है।

क्यों बढ़ रहा है यह खतरा?
हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के अनुसार, काम के मशीनीकरण के कारण नयापन खत्म हो रहा है। साथ ही, योग्यता के अनुसार जिम्मेदार न मिलना, जरूरत से ज्यादा स्टाफ होना, काम का गलत डिस्क्रिप्शन भी बोरआउट की वजह है। इसके पीछे मैनेजर का रवैया भी जिम्मेदार है कि वे केवल इस बात का ध्यान रखते हैं कि कर्मचारी काम करते हुए दिखे। 

 

Aditya
Author: Aditya

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