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तथ्य छिपाने पर पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट सख्त, जमानत याचिका पर लगा झटका

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चंडीगढ़
 पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने करनाल के निसिंग क्षेत्र में 21 वर्षीय युवती से कथित छेड़छाड़ और पीछा करने के मामले में आरोपित की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी

अदालत ने पाया कि आरोपित ने एफआईआर के अनुवादित संस्करण में एक महत्वपूर्ण आरोप को जानबूझकर हटाकर अदालत के समक्ष अधूरी और भ्रामक तस्वीर पेश की। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी तथ्यात्मक जानकारी छिपाने वाला व्यक्ति अग्रिम जमानत जैसी विवेकाधीन राहत पाने का हकदार नहीं हो सकता।

जस्टिस संदीप मौदगिल ने अपने आदेश में कहा कि यह कोई मामूली भाषाई त्रुटि नहीं, बल्कि अभियोजन के पूरे मामले की नींव से जुड़ा गंभीर आरोप है। अदालत के अनुसार आरोपी ने रिकार्ड का गलत प्रस्तुतीकरण किया और महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए, जिससे उसकी नीयत पर सवाल खड़े होते हैं।

मामले के अनुसार निसिंग थाना पुलिस ने 14 मई को भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की थी। शिकायतकर्ता युवती ने आरोप लगाया था कि 12 मई को वह गांव के मंदिर जा रही थी, तभी आरोपित उसका पीछा करते हुए आया।

उसने पीछे से उसकी चप्पल पर पैर रखा, कंधे और निजी अंगों को छुआ तथा विरोध करने पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। शिकायत में यह भी कहा गया कि आरोपित काफी समय से उसका पीछा कर रहा था, अशोभनीय इशारे करता था और बाद में उसके घर के आसपास भी घूमता रहा, जिससे वह भयभीत थी।

युवती का बयान बाद में न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 के तहत भी दर्ज किया गया, जिसमें उसने अपने आरोप दोहराए।दूसरी ओर आरोपित ने अदालत में दलील दी कि एफआईआर दो दिन की देरी से दर्ज हुई और यह उसे फंसाने के उद्देश्य से दर्ज कराया गया एक जवाबी कदम है।

उसने दोनों परिवारों के बीच पुरानी रंजिश का हवाला देते हुए खुद को निर्दोष बताया।हालांकि सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि आरोपित द्वारा पेश किए गए एफआईआर के अंग्रेजी अनुवाद में निजी अंगों को छूने संबंधी आरोप को हटा दिया गया था। अनुवाद में केवल कंधा छूने और अन्य सामान्य आरोपों का उल्लेख किया गया।

अदालत ने कहा कि यदि पूरा आरोप निष्पक्ष रूप से सामने रखा जाता तो स्पष्ट होता कि मामला केवल पीछा करने या अभद्र टिप्पणी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें निजी अंगों से शारीरिक छेड़छाड़ का विशिष्ट आरोप भी शामिल है।

अदालत ने कहा कि अग्रिम जमानत मांगने वाले व्यक्ति का दायित्व है कि वह सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का पूर्ण और निष्पक्ष खुलासा करे। चूंकि आरोपित ने ऐसा नहीं किया और रिकार्ड के महत्वपूर्ण हिस्से को दबाया, इसलिए वह अदालत के समक्ष साफ हाथों से नहीं आया। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने उसकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

Aditya
Author: Aditya

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