पानीपत.
पुराने कपड़ों, फैक्ट्रियों की कतरन और टेक्सटाइल वेस्ट से नया माल तैयार करने वाले उद्योगों को अब अपने उत्पाद में इस्तेमाल हुए रिसाइकिल धागे का पूरा हिसाब देना होगा। विदेशी खरीदार केवल तैयार कपड़े की गुणवत्ता, रंग और कीमत ही नहीं, यह भी जानना चाहते हैं कि उसमें कितना धागा पुराने कपड़ों से बना है और कितना नया है।
यूरोपीय देशों में इस तरह की मांग बढ़ने से टेक्सटाइल निर्यातकों के लिए उत्पादन से लेकर पैकिंग तक का डिजिटल रिकॉर्ड व्यवस्थित रखना जरूरी होता जा रहा है। उद्योगपतियों ने बताया कि पानीपत की पहचान देश के प्रमुख टेक्सटाइल केंद्रों में है। यहां पुराने कपड़ों और फैक्ट्री की कतरन को छांटकर, उनकी कटाई व प्रसंस्करण के बाद रेशे तैयार किए जाते हैं। इनसे दोबारा धागा बनाकर कारपेट, बाथ मैट, कंबल, दरियां, चादरें और होम फर्निशिंग से जुड़े दूसरे उत्पाद तैयार किए जाते हैं। तैयार माल यूरोप समेत कई विदेशी बाजारों में भेजा जाता है। उद्योगपति सुमित अरोड़ा ने बताया कि अब खरीदारों की दिलचस्पी इस बात में भी है कि तैयार उत्पाद में रिसाइकिल रेशे की हिस्सेदारी कितनी है। मसलन, किसी कारपेट या कंबल में 60 प्रतिशत धागा पुराने कपड़ों से तैयार किया।
दूसरे देशों के खरीदार भी मांगते हैं जानकारी
पानीपत से हर साल करीब 15 हजार करोड़ रुपये के टेक्सटाइल उत्पादों का निर्यात होता है। इसमें यूरोपीय देशों के साथ लगभग 5500 करोड़ रुपये का कारोबार शामिल है। इस बड़े बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए स्थानीय निर्यातकों को खरीदारों की बदलती शर्तों के अनुरूप काम करना होगा।
उत्पादन का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखना होगा –
रिसाइकिल धागे और नए धागे की मात्रा बताने के लिए उत्पादन का रिकॉर्ड व्यवस्थित रखना होगा। कपड़े में 60 प्रतिशत रिसाइकिल धागे का प्रयोग होता है जबकि 40 प्रतिशत नया लगाया जाता है।
– विनोद धमीजा, एक्सपोर्टर
उद्योगों को व्यवस्था मजबूत करनी पड़ेगी –
टेक्सटाइल उत्पाद तैयार किए जाते हैं। अब रिसाइकिल सामग्री का हिसाब रखने के लिए कच्चे माल से तैयार उत्पाद तक की जानकारी जरूरी है। इससे उद्योगों को अपनी व्यवस्था मजबूत करनी पड़ेगी।
– नितिन अरोड़ा, उद्योगपति








