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बच्चों की पढ़ाई पर मोबाइल का असर, होमवर्क छोड़ रील्स-गेम्स में उलझ रहे बच्चे; पेरेंट्स रहें अलर्ट

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चंडीगढ़

बच्चा स्कूल से आता है तो अभिभावक उसे होमवर्क करने के लिए मोबाइल थमा देते हैं। शुरुआत में बच्चा मोबाइल फोन पर पढ़ाई से जुड़ा काम देखता है, लेकिन कुछ ही देर में रील और गेम में उलझ जाता है। धीरे-धीरे मोबाइल फोन पर समय बिताने की आदत पढ़ाई से ध्यान हटाने लगती है।

इसका असर बच्चों के टेस्ट और परीक्षा के अंकों पर भी पड़ सकता है। कम अंक आने पर बच्चे तनाव में आ जाते हैं। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस (10 अक्टूबर) के अवसर पर विशेषज्ञों ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई है।

उनका कहना है कि पढ़ाई के लिए मोबाइल का इस्तेमाल जरूरी हो सकता है, लेकिन अभिभावकों को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि बच्चा मोबाइल पर क्या देख रहा है और कितना समय बिता रहा है।

पीजीआई के डिपार्टमेंट आफ फिजिकल एंड रिहैबिलिटेशन मेडिसिन के डाॅ. भविंदर सिंह के अनुसार, सामान्य बच्चों में भी ध्यान भटकने की समस्या के मामले बढ़ रहे हैं। वहीं, व्यवहार संबंधी समस्याओं से जूझ रहे बच्चों पर तेज रोशनी और आवाज वाले डिजिटल कंटेंट का असर पड़ सकता है।

इससे कुछ बच्चों में चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार बढ़ सकता है। ऐसे में अभिभावकों को बच्चों की गतिविधियों और व्यवहार में होने वाले बदलावों पर नजर रखनी चाहिए। डाॅ. सिंह के अनुसार, पढ़ाई में परेशानी, परीक्षा का दबाव और अभिभावकों की अपेक्षाएं भी बच्चों में तनाव बढ़ा सकती हैं।

व्यवहार में देखे बदलाव तो बातचीत कर समझाएं
बच्चों के व्यवहार में लगातार बदलाव दिखे तो उन्हें डांटने के बजाय उनसे बातचीत करनी चाहिए। यदि बच्चा लगातार उदास रहे, खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करे या आत्महत्या जैसे विचार व्यक्त करे तो इसे गंभीरता से लेते हुए तुरंत विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए।

बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए उनकी दिनचर्या नियमित रखना जरूरी है। अभिभावक बच्चों को पर्याप्त नींद लेने दें। रोजाना शारीरिक गतिविधियों और खेलकूद के लिए समय निकालें। मोबाइल और टीवी का इस्तेमाल सीमित रखें। बच्चों से खुलकर बातचीत करें, ताकि वे अपनी परेशानी बिना डर के बता सकें।

मानसिक स्वास्थ्य सुधारने में मददगार ऑक्यूपेशनल थेरेपी
मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों के उपचार और पुनर्वास में ऑक्यूपेशनल थेरेपी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, देश में 10.6 से 15 प्रतिशत वयस्क मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं, जबकि 70 से 92 प्रतिशत लोगों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता। जागरूकता और विशेषज्ञों की कमी इसकी प्रमुख वजह हैं।

 

Aditya
Author: Aditya

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